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Wednesday, 11 July 2018

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इस्लामी आतंकवादी भक्तियार खिल्जी ने विश्व प्रसिद्ध नलंदा विश्व विद्यालय को छात्रॊं समेत जलाकर राख कर दिया था।

इस्लामी आतंकवादी भक्तियार खिल्जी ने विश्व प्रसिद्ध नलंदा विश्व विद्यालय को छात्रॊं समेत जलाकर राख कर दिया था।

भारत सनातन काल से ही ज्ञान का सागर रहा है। यहां के निवासी अपरिमित ज्ञानी थे, वे विज्ञान और तंत्राज्ञान के रचैता थे। हमारी धरॊहर वेद-उपनिषद, रामायण- महाभारत और भगवद्गीता है। पूरे विश्व में जब कॊई पाठशाला भी नहीं बनी होगी तब से ही अखंड भारत के विश्वद्यालय में विश्व भर के छात्रॊं को पढ़ाया जाता था। नलंदा एक ऐसा विश्व विद्यालय था जहां केवल देश से ही नहीं अपितु विदेश से भी जिज्ञासू पढ़ने और संशॊधन करने आते थे।
मुहम्मद भक्तियार खिल्जी एक इस्लामी आतंकवादी सेनापती था जिसने 1190 के दौरान भारत में लूट पाट और दंगा मचाया था। उसने सबसे ज्यादा हिन्दुओं का धर्मांतर्ण करवाया इसलिए आज भी इस्लामिक बांग्लादेश में भक्तियार की पूजा की जाती है। नलंदा विश्व विद्यालय 400-1100 AD में भारत के बिहार में स्थित था। इसकी स्थापना गुप्त वंश के शासक कुमार गुप्त ने की थी जिसके साक्ष यहां प्राप्त मुद्राओं में मिले हैं।  तक्षशिला के बाद, नलंदा पहला और एक मात्र पूर्ण रूपी आवासीय हिन्दू और बौद्ध विशविद्यालय हुआ करता था। नलंदा में करीब 10000 छात्र और करीब 2000 शिक्षक हुआ करते थे। नलंदा में केवल यॊग्यता के आधार पर ही छात्रों एवं शिक्षकों का चयन होता था।

नलंदा में भौतिक विज्ञान, तत्वज्ञान, हिंन्दू सांख्य, यॊग, वेद, पाली, माध्यमिक और तंत्र शास्त्र जैसे अनेक विषयों को सिखाया जाता था। आस्तिक और नास्तिक दोनों प्रकार के अध्ययन नलंदा में हुआ करते थे। 800 साल तक नलंदा हिन्दू और बौद्ध धर्म के शासन में अनेकों छात्रों को ज्ञान प्रदान करता रहा। बौद्ध पाला और हिंन्दु शासक गुप्त और सेना के काल में नलंदा की कीर्ती चारॊं दिशा में फैली हुई थी।
विश्व के अन्य भूभाग जैसे कॊरिया, चीन, जपान, तिब्बत, इंडॊनेशिया, टर्की और पर्शिया से छात्र और शिक्षक नलंदा की ओर खींचे चले आते थे। ह्यूएन-स्तांग और आई-त्सिंग जैसे छात्र भी नलंदा में ही पढ़ते थे। उन्होंने नलंदा के वर्णन में लिखा है की नलंदा में 800 विशाल कक्ष, 300 मकान और ध्यान कक्ष एवं छात्रों को पढ़ाने के कक्ष प्रत्येक रूप से हुआ करते थे। उन्होंने नलंदा को दुनिया का सबसे बड़ा विश्व विद्यालय कहा था हम केवल अंदाज़ा ही लगा सकतें है की नलंदा का प्राकार कितना विशाल हॊगा की वहां एक ही बार में 10000 छात्र पढ़ सकते थे। अंदाज़ा है की 1.5 लाख वर्ग फीट से भी अधिक विशाल था नलंदा विश्व विद्यालय!

भारत की ज्ञान परम्परा पर हर भारतीय को गौरव हॊना चाहिए। हम उस देश के निवासी है जहां ज्ञान अर्जन हेतु विश्व के कई देश से छात्र आते थे। नलंदा हमारे पूर्वजों की अपरिमित ज्ञान का जीता जागता उदाहरण हुआ करता था। पूरे विश्व में नलंदा की चर्चा हुआ करती थी। आप जान कर दंग रह जाएंगे की पूरे 8500 छात्र और 1500 शिक्षक दिन में 100 उपन्यास लेते और देते थे। शिक्षक और छात्र एक मिनट भी नहीं गवाते थे और पूरा समय अध्ययन निरत रहते थे। नलंदा में शिक्षा पूर्ण रूप से निशुल्क था। एक पैसा भी छात्रॊं से नहीं लिया जाता था। जन सामान्य और राजा-महाराजा खुल कर नलंदा को दान- दक्षिणा देते थे। इसी कारण नलंदा में छात्रॊं से कॊई शुक्ल नहीं लिया जाता था।
एसे विश्व विख्यात नलंदा को ग्रहण तब लगा जब एक मुस्लिम आतंकवादी की कुदृष्ठी उस पर पड़ी। 1193 का वह दौर नलंदा के लिए आत्मघाती साबित हुआ। भक्तियार खिल्जी जैसे जिहादी की बुरी नज़र उस पर पड़गयी। इस समय के बाद से भारत में बौद्ध धर्म की अवनती भी हुई थी। भक्तियार ने नलंदा को खंडहर बनादिया। जानकार कहते हैं की भक्तियार ने नलंदा के पुस्तकालय को छात्रॊं समेत जला दिया। नलंदा में तीन मंज़िलों का पुस्तकालय था जहां नब्बे लाख से ज्यादा पुस्तकें थी जो हमारे मातृ भूमी की धरॊहर थी, उसे खिल्जी ने जला दिया था। करीब तीन महीनों तक वहां पुस्तकें जलतीं रहीं। अंदाज़ा लगाइये की कितना विशाल होगा वह पुस्ताकालय!

1235 में तिब्बत से एक चांग लॊत्सवा नामक अनुवादक नलंदा आया था जो लिखता है की नलंदा को पूरी तरह लूट लिया गया था। वह इस्लामी बरबर्ता का निशानी बनकर एक खंडहर बन चुका था। उसके पश्चात भी नलंदा वहां खड़ा था और 7० छात्र वहां पढ़ रहे थे! एक मतांद जिहादी ने अपने 200 सैनिकों की सहायता से नलंदा को घेर लिया। वहां के मूल निवासी ब्राह्मणॊं का सिर मुंडवाया और उनका गला काट दिया। भारत की धरोहर नलंदा को जलाकर राख करदिया। लूट-पाट मचाकर उसे खंडहर बनादिया।
नलंदा को अगर जलाया न होता तो सॊचिए भारत आज कहां पहुंचता। जिस भारत ने विश्व को वेद-विज्ञान का ज्ञान दिया था आज वह भारत बौधिक दिवालिया देश बन कर खड़ा है। लूट पाट करनेवालों को महान बताकर अपने ही देवी-देवताओं को झूठ साबित करने पर उतावला है। नलंदा का खंडहर हमारे पूर्वजॊं की महान बुद्धिमता की निशानी है। हमारे गुरुकुल परंपरा की निशानी है। विश्व पर हमारे ज्ञान की छाप की निशानी है। हमारी धरॊहर हमारा गौरव है नलंदा विश्व विध्यालय। क्या उसके लुप्त गौरव को पुनः स्थापित करना हमारा कर्तव्य नहीं है? हमारी गुरुकुल परंपरा का पुनरुत्थान करना अब आवश्यक हो चुका है। हमारी सनातन परंपरा को एक बार फिर हमें अपनाना होगा और विश्व के पटल पर भारत को विश्व गुरू के अपने मूल अवतार पर लाना होगा।
Source:https://postcardhindi.news/

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